आज से 200 साल पहले भारत एक दोराहे पर खड़ा था, एक तरफ़ अंग्रेज़ देश को ग़ुलामी में जकड़ रहे थे, दूसरी तरफ़ कुरीतियाँ समाज को पीछे ले जा रही थीं | ऐसे समय में कुछ लोगों ने सोते समाज को जगाने का बीड़ा उठाया | जिसमें एक बहादुर युवक भी शामिल हुआ , उसने मूर्तिपूजा और रूढ़िवादी हिन्दू परंपराओं के विरुद्ध काम किया, वह हमेशा अंधविश्वास के खिलाफ खड़ा रहता | इस दौरान युवक ने समाज में फैली कुरीतियों जैसे सती प्रथा और बाल विवाह के ख़िलाफ़ कई आवाज़ें उठाई | साथ ही  सती प्रथा के ख़िलाफ़ क़ानून बनवाया | यह युवक कोई और नहीं भारतीय पुनर्जागरण के अग्रदूत और अपने समय के अप्रतिम समाज सुधारक 'राजा राम मोहन राय' थे |


22 मई 1772 को हुगली के राधानगर गांव के एक बंगाली हिंदू परिवार में राजा राममोहन राय का जन्म हुआ | उनके पिता रमाकांत राय वैष्णव थे और उनकी माता का नाम तारिणी देवी शैव था | राय ने अपनी प्रारंभिक शिक्षा गांव में ही हासिल की | जिसके बाद उनके पिता ने उन्हें बेहतर शिक्षा देने के लिए पटना भेजा | 15 साल की उम्र में उन्होंने बंगला, पारसी, अरबी और संस्कृत सीख ली , इससे यह अंदाजा लगाया जा सकता है कि वह कितने बुद्धिमान रहे होंगे |


शिक्षा पूरी होने के बाद साल 1803 में राय अपने एक अंग्रेज मित्र जोकि एक सरकारी अधिकारी था,कि मदद से ईस्ट इंडिया कंपनी में मुंशी बन गए और कई समय तक उन्होंने वहाँ काम किया | लेकिन इस दौरान उन्होंने कभी भी अपने स्वाभिमान और निडरता से समझौता नहीं किया | इसकी एक मिसाल 1808 और 1809 के बीच उनकी भागलपुर में तैनाती के समय घटी घटना भी है, जिसमें उन्होंने भागलपुर के अंग्रेज कलेक्टर की ओर से अपने साथ की गई बदतमीजी की गवर्नर जनरल लॉर्ड मिंटो से शिकायत की, और तभी माने थे जब गवर्नर जनरल ने कलेक्टर को कड़ी फटकार लगाई |


साल 1811 में मोहन राय किसी काम के लिए विदेश गए थे, जब अचानक उनके भाई की मृत्यु हो गई | उस समय सती प्रथा का चलन था, जिसके चलते उनकी भाभी को सती प्रथा का शिकार होना पड़ा | अपने प्रियजन को इस प्रथा का हिस्सा बनते देख उन्होंने इस प्रथा का विरोध किया | जिसके बाद उन्होंने इस प्रथा को खत्म करने के लिए ब्रिटिश सरकार को कई पत्र लिखें और उनसे मदद भी मांगी | उनके कई प्रयासों का फल तब मिल जब ब्रिटिश हुकूमत ने 1829 में सती प्रथा पर बैन लगा दिया |


इतना ही नहीं उन्होंने पत्रकारिता के क्षेत्र में भी कई कार्य किए | साल 1828 में उन्होंने ब्रह्मों समाज की अस्थपना की , साथ ही उन्होंने आत्मीय सभा का गठन भी किया, जहां धार्मिक चर्चा होती है | बाल विवाह के खिलाफ भी उन्होनें कई अभियान छेड़े | जिस वजह से गोपाल कृष्ण गोखले उन्हें “फादर ऑफ मॉडर्न इंडिया” भी कह कर बुलाते थे | राजा राम मोहन के कई प्रयासों से हिन्दू समाज में कई सुधार आए, हालांकि उस दौर में कई लोगों ने उनका विरोध भी किया |


वहीं साल 1831 से 1833 तक अपने इंग्लैंड प्रवास काल में राममोहन ने ब्रिटिश भारत की प्राशासनिक पद्धति में सुधार के लिए आन्दोलन किया | ब्रिटिश संसद में भारतीय मामलों पर परामर्श लिए जाने वाले वे प्रथम भारतीय थे | हाउस ऑफ कॉमन्स की प्रवर समिति के सामने अपना साक्ष्य देते हुए उन्होंने भारतीय प्राशासन की प्राय: सभी शाखाओं के संबंध में अपने सुझाव दिया | भारत में शैक्षिक सुधारों के लिए भी उन्होंने कई लंबे-लंबे संघर्ष किए | कम ही लोग जानते हैं कि राममोहन ‘राजा’ शब्द के प्रचलित अर्थों में राजा नहीं थे | उनके नाम के साथ यह शब्द तब जुड़ा जब दिल्ली के तत्कालीन मुगल शासक बादशाह अकबर द्वितीय ने उन्हें राजा की उपाधि दी | दरअसल अकबर द्वितीय ने ही साल 1830 में उन्हें अपना दूत बनाकर अपनी पेंशन से संबंधित शिकायतों के लिए इंग्लैंड भेजा जिसके बाद उन्हें राजा की उपाधि दी गई | वहीं साल 1833 में 27 सिंतबर को इंग्लैंड के ब्रिस्टल में ही मेनेंजाइटिस से पीड़ित होने के बाद राममोहन की मुत्यु हो गई | जिसके बाद उनका अंतिम संस्कार भी वहीं किया गया | आपको बता दें ब्रिटेन के ब्रिस्टल शहर में राजा राममोहन राय की समाधि आज भी मौजूद है |


1960: चिली के दक्षिणी तट पर आए सबसे बड़े भूकंपों में से एक में 5,700 लोगों की मौत हो गई। 

1963: भारत के पहले ग्लाइडर रोहिणी ने उड़ान भरी। 

1972: अमेरिका के राष्ट्रपति रिचर्ड एम निक्सन मॉस्को पहुंचे। यह अमेरिकी राष्ट्रपति की सोवियत संघ की पहली यात्रा थी। 

1988: भारत ने स्वदेश में विकसित अन्तरमहाद्वीपीय बैलिस्टिक मिसाइल अग्नि का सफल परीक्षण किया। 

2003: अल्जीरिया में आए विनाशकारी भूकम्प में दो हज़ार से अधिक लोग मारे गए।